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केचरी मुद्रा: शरीर एवं मन को शांति और आध्यात्मिक जागरूकता का अनुभव



केचरी मुद्रा एक योगिक तकनीक है जो जीभ को नाक के ढीले भाग में घुमाकर उसे नाक की छिद्र में डालने के माध्यम से की जाती है। संस्कृत में "केचरि" अर्थात "अंतरिक्ष में चलना" होता है, जबकि "मुद्रा" शब्द "चिह्न" या "छाप" का अर्थ होता है।

केचरी मुद्रा का अभ्यास पाइनील और पीट्यूटरी ग्रंथियों को सक्रिय करने का काम करता है, जो दिमाग में स्थित होते हैं, और शरीर की ऊर्जा प्रणाली पर सीधा असर डालते हैं। इसके अलावा, इसे माना जाता है कि यह मन को शांत करता है, गहरी विश्राम को बढ़ाता है, और आध्यात्मिक जागरूकता को बढ़ाता है।

केचरी मुद्रा एक उन्नत योगाभ्यास माना जाता है और इसे एक क्षमतिशाली योग शिक्षक के मार्गदर्शन और निरंतर अभ्यास के तहत सीखा और किया जाना चाहिए। इस तकनीक को सावधानीपूर्वक निष्पादित करना आवश्यक है और जीभ को नाक की छिद्र में जबरदस्ती न करना चाहिए क्योंकि इससे घाव या चोट का खतरा हो सकता है।

यद्यपि केचरी मुद्रा एक शक्तिशाली तकनीक है, तो भी इसे समझना और सीखना आसान नहीं है। इसके लिए योग शिक्षक की सहायता लेना जरूरी होता है।

यदि आप योग के अभ्यास में नए हैं, तो आपको सबसे पहले योग के साधनों का अभ्यास करना चाहिए जैसे आसन, प्राणायाम, ध्यान आदि। इन सभी साधनों के अभ्यास से आपका शरीर विश्राम करता है और धीरे-धीरे आप योग के उन्नत साधनों पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं।

इसलिए, अगर आप योग के उन्नत साधनों का अभ्यास करना चाहते हैं तो सही तकनीक के साथ सही मार्गदर्शन का उपयोग करें और जब आप इसके लिए तैयार हो जाएं, तब केचरी मुद्रा का अभ्यास करें।



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